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इतंजार - एक अनोखी कहानी - Part -1 

प्रस्तावना, 
       हेल्लो, मेरा नाम राधा तिवारी है । मेरी यह कहानी एक लड़की की है जिसे न तो सपने देखना आता है और न ख़्वाब बुनना। ज़िन्दगी में हमेशा एक राह पर चलने वाले पैर जब अपने आप रास्ता बदल दें तो क्या होता है? हमेशा किताबों के पन्नो पर शब्दों को ढूंढने वाली आंखे अचानक किसी और को खोजने लगे तब क्या होता है? लाइब्रेरी की तरफ जाने वाले कदम जब कैंटीन की ओर बढ़ने लगे तब क्या होता है? हमेशा मायूस रहने वाला चेहरा अचानक खिलखिलाने लगे तब क्या होता है? और मेट्रो में हज़ारों के बीच अकेली सफर करने वाली एक लड़की जब पहली बार एक लड़के की बाइक पर बैठे, तब क्या होता है?

इनका जवाब ज़ेहनी पागलपन है या कुछ और? पता नहीं... पर हर सवाल का एक सवाल होता है और एक जवाब। और हर कहानी के पीछे एक और कहानी होती है... कहानी उस सिक्के की तरह होती है जिसके दो पहलू होते हैं। मेरी कहानी के भी दो पहलू हैं... पहला उस लड़की का जिसकी कहानी आप पढ़ेंगे और दूसरा... वो भी पता चल जाएगा पर पहले इतंजार की एक अनोखी कहानी।


इस कहानी की शुरुवात करते है - ऑटो से उतरकर मानसी ने अपना बड़ा सा सूटकेस और एक छोटा थैला निकाला और ऑटो वाले को पैसे देने लगी।। मोलभाव करना उसका स्वभाव नहीं था इसलिए उसने ज्यों के त्यों चार सौ रुपये ऑटो वाले को पकड़ा दिए और वो चला गया। दिन भर के पचास ग्राहकों में शायद ही उसे कोई ऐसा मिलता होगा जो बिना मोलभाव के पैसा दे जाता हो। और फिर सुबह-सुबह क्यों किसी का दिन ख़राब करना। यह सोचकर मानसी मुस्कुराते हुई घर के अंदर आ गयी। सामान अभी बाहर ही था। अंदर आकर उसने माँ-पापा के पैर छुए और छोटे भाई को नींद से जगाकर सामान अंदर लाने को कहा।
'बेटा यूं अचानक कैसे?' पापा ने मुस्कुराते हुए पूछा।

'हां पापा! वो निशा थी ना, मेरी ग्रेजुएशन की दोस्त... उसकी शादी हो रही है। तो उसी के लिए आना पड़ा।'

चाय वग़ैरह हो जाने के बाद आख़िर माँ ने उससे पूछ ही लिया, 'तुमने अपनी शादी के लिए कुछ सोचा है या अभी भी?'

'मुझे शादी नहीं करनी।'

मानसी ने वही पुराना दो टूक जवाब दिया और उठकर अपने कमरे में चली गयी।

'कब समझेगी ये लड़की? तीस बरस की हो गयी है लेकिन शादी के नाम पर तुनक जाती है। अरे समाज को मुंह दिखाना है हमें! अब भी इसकी शादी नहीं की तो रिश्ते मिलने भी बन्द हो जाएंगे। और हम लोगों को क्या जवाब देंगे!?' माँ झल्ला गयी थीं।

'अरे! कोई पसन्द है तो बता क्यों नहीं देती ताकि हम भी निश्चिंत हो जायें!' माँ ने दोबारा चिल्ला कर कहा।

मानसी अपने कमरे का दरवाज़ा बन्द करके वहीं ज़मीन पर बैठी सब कुछ सुन रही थी। उसकी आंख से एक कतरा आंसू गिरा और ज़मीन पर कहीं खो गया। उसने आंसू पोछे और जाकर अपने कपड़े समेटने लगी। आंसू उसकी आंखों से गिरते, और उसके गालों पर जाकर कहीं खो जाते थे। वो अलमारी में कपड़े सजाने लगी। पुराने कपड़ों को हटाया तो अलमारी से एक पिंक स्कार्फ़ नीचे ज़मीन पर गिर गया। मानसी की नज़र उसपर पड़ी और उसके होठों पर एक फ़ीकी सी मुस्कुराहट आ गयी। उसने स्कार्फ़ उठाया और सहेजकर अलमारी में बाकी कपड़ों के साथ रख दिया।

बात कुछ 8 साल पुरानी थी। मानसी एक आम सी लड़की थी। जिसने बारह साल गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की और 3 साल ग्रेजुएशन में भी गर्ल्स कॉलेज ही मिला। पर मानसी को इससे कोई शिकायत नहीं थी। उसने उस दुनिया को अपनी दुनिया स्वीकार कर लिया था। इस दुनिया में लड़कों के नाम पर बस उसका छोटा भाई अभिषेक ही था। जो उससे करीब 4 साल छोटा था। मानसी उससे अपने मन की सारी बातें कहती थी और वो बेचारा बोर हो जाता था। जब कभी उसे मानसी का मन भटकाना होता तो वो बस इतना ही कहता था…

'दीदी! अब समझ आता है तुम्हारा आज तक कोई ब्वॉयफ़्रेंड क्यों नहीं बना? उसे भो इतना ही बोर कर दोगी तुम!'

'चुप कर! मुझे नहीं बनाना कोई ब्वॉयफ़्रेंड, मैं ऐसे ही ठीक हूँ।' मानसी से उसे एक चपत लगाकर कहा।

'बनेगा भी नहीं तुमसे।' अभिषेक ने मानसी की चोटी खींचकर कहा।

इसपर मानसी ने खड़े होकर खुद को आईने में दो बार दायें-बायें घूमकर देखा।

'अरे क्या देख रही हो, ओवरवेट हो गयी हो, थोड़ा कम खाया करो।' अभिषेक ने उसे छेड़ते हुए कहा।

मानसी ने गुस्से से उसकी ओर देखा और फिर दोबारा खुद को आईने में देखने लगी।

अगले दिन उसका मास्टर्स का एड्मिशन था। पापा को साथ चलना था आर्ट्स फैकल्टी तक। आज तक उनके बिना वो कहीं भी एडमिशन कराने नहीं पहुंची थी। आर्ट्स फैकल्टी के पीछे वाले गेट पर पापा ने बाइक खड़ी की और फिर दोनों लोग अंदर चले गए। मानसी इधर-उधर लोगों को देख रही थी। उनका पहनावा उनका चाल-चलन उसके हिसाब से थोड़ा अलग था। पापा और मानसी दोनों लोग राजनीति विज्ञान के डिपार्टमेंट के पास समय पर पहुंच गए। मानसी के ग्रेजुएशन में 74% थे इसीलिए उसका एडमिशन मेरिट बेस पर पहली ही कट ऑफ में हो गया था। प्रोसीजर ज्यादा लंबा नहीं चला और पापा उसे लंच टाइम तक घर पहुंचा के दफ़्तर चले गए।

क्लासेज शुरू होने में अभी कुछ दिन थे। तब तक मानसी घर बैठे ही पढ़ाई कर रही थी। और कभी-कभी माँ का काम में हाथ बँटा देती थी।

कॉलेज का पहला दिन था। मानसी समय पर कैंपस पहुँच गयी थी। मैथ्स डिपार्टमेंट के सामने ही सोशल साइंस डिपार्टमेंट की बिल्ड़िंग थी जिसपर दूसरे माले पर राजनीति विज्ञान का विभाग था। और हॉल नंबर 1 में क्लास होनी थी। क्लास खत्म हुई सिर्फ 15 मिनट में। सर ने कहा कि आज केवल इंट्रोडक्शन क्लास है। पढ़ाई अगले हफ़्ते से होगी। तब तक सारा सिलेबस एक बार देख लेने को कहा। खैर, आने का एक फायदा रहा, उसे हुमा नाम की एक नई दोस्त मिल गयी। दोनों क्लास से निकलकर सीधा आर्ट्स फैकल्टी के पास पहुंचे। वहां विवेकानंद जी की मूर्ति के थोड़ी दूरी पर घास में बैठकर दोनों लड़कियाँ लंच कर रही थीं। अमूमन दिन के समय उस जगह पर हर मौसम में मजमा रहता है। चारों ओर आवाज़ें गूँज रही थीं। कहीं लोग सिलेबस डिसकस कर रहे थे तो कहीं विद्या बालन की आने वाली फ़िल्म डर्टी पिक्चर का प्लॉट डिसकस हो रहा था। कहीं कोई परेशान बैठा था तो कहीं कोई उदास। कोई सिगरेट जला रहा था तो कोई पॉल्युशन पर ज्ञान झाड़ रहा था। इन सबके बीच मानसी की नजर एक पल के लिए रुकी और फिर ठहर गयी। उसके आस-पास होने वाला शोर उसके लिए बेमाइने हो गया। ऐसा कुछ ख़ास नहीं था उसकी आंखों के सामने पर उसे आकर्षित करने के लिए वो हँसी का ठहाका काफी था।

सफेद रंग की कमीज़ और नीली जीन्स पहने वहां एक लड़का खड़ा था। रंग सांवले से एक शेड ऊपर, हाइट 5 फ़ीट 11 इंच, बड़ी-बड़ी आंखें, चेहरे पर हल्की दाढ़ी और होठों पर एक लंबी सी मुस्कान। उसके दोनों हाथ जीन्स की जेब में थे और वो बिना रुके मुस्कुराता जा रहा था और हँसी की जो रेखा उसके चेहरे पर खिंच रही थी वो ही रेखा मानसी के चेहरे पर दिखाई दे रही थी।

'कौन है ये?' मानसी ने कहा।

'कौन ये?' हुमा ने सिर उठाकर इधर-उधर देखा।
'वो सामने सफेद शर्ट में।'

'सीनियर है कोई। एडमिशन वाले दिन आया था डिपार्टमेंट के पास।'

'हमारा सीनियर है?'

'नहीं शायद हिस्ट्री डिपार्टमेंट में है। पर तू क्यों इतना पूछ रही है?'
'कुछ नहीं। बस ऐसे ही।'

हुमा दोबारा अपने खाने पर ध्यान देने लगी और मानसी ने एक बार फिर उस लड़के को देखा।

प्यार होता है तो ऐसा ही लगता है क्या? मानसी ने उस दिन के बाद कई रोज़ उस लड़के को वहां नहीं देखा। पर बिना माने भी वो हर दिन उसे तलाश जरूर करती थी। उसे ज्यादा की इच्छा भी नहीं थी, वो बस हर दिन उसे एक नजर देखना ही चाहती थी। फिर एक दिन वो दिखाई पड़ा। साथ में एक लड़की भी थी, दोनों ने एक दूसरे का हाथ थामा हुआ था। दोनों आर्ट्स फैकल्टी के फ्रंट गेट से अंदर घुसे थे और लॉ फैकल्टी की ओर जा रहे थे। मानसी IRCTC की तरफ जाने वाले रास्ते के पास खड़ी उन दोनों को ही देख रही थी। दोनों दूसरी तरफ चले गए, यहां बेचारी मानसी ने सिर झुकाया और IRCTC के पास बने एम्फीथिएटर की सीढ़ियों पर जाकर बैठ गयी।


माँ ने दरवाज़ा खटखटाया तो मानसी हड़बड़ाकर बेड से उठ गयी। उसके ख्याल उसे आठ साल पहले ले गए थे। हम अतीत से कभी नहीं भाग सकते। अतीत वो परछाईं है, जो अंधेरे में भी साथ रहती है। अंधेरे में उसका अंश गायब जरुर हो जाता है परन्तु वो साथ फिर भी नहीं छोड़ती। अतीत से ज्यादा वफ़ादार शायद कुछ नहीं है इस दुनिया में। लोग उसे बदल नहीं सकते, न वहां कभी पहुंच सकते हैं। जिस तरह इंसान का उसके भविष्य पर कोई नियंत्रण नहीं उसी तरह अतीत पर कोई मलाल भी नहीं होना चाहिए।

मानसी ने उठकर हाथ-मुंह धोया और दोपहर के खाने के लिए हॉल में पहुंच गयी। सब सामान्य था, माँ किचन में रोटियां सेंक रही थीं और भाई टी वी पर कोई बेकार सी फ़िल्म देख रहा था। पापा सुबह ही ऑफिस चले गए थे। मानसी ने मेज़ पर रखा अख़बार उठाया और सोफ़े पर बैठकर पढ़ने लगी। खाना लग गया था, भाई ने मानसी को आवाज दी और वो अख़बार वापिस रख खाने की मेज के पास चली गयी। खाना खाते हुये तीनो शांत बैठे थे। मानसी ने एक नजर माँ को देखा और फिर खाने लगी। माँ से उस तरह बेरुखी करने पर वो शर्मिंदा थी पर माफ़ी भी नहीं मांगना चाहती थी। ख़ैर, खाना ख़त्म हुआ और वो अपने कमरे में वापस आ गयी। बेड पर बैठते ही उसने आँखें बन्द की और दोबारा 8 साल पहले पहुंच गयी।

'यार ये साला पेन क्यों नहीं चल रहा? दूसरा पेन दे।'

'दूसरा पेन नहीं है मेरे पास।'

'अब साइन कैसे करूँगा मैं? इसे आज ही जमा करना है वरना आखिरी डेट कबकी जा चुकी है, इस बार पक्का ये साले मुझे सस्पेंड कर देंगे।' यह कहकर उसने अपने हाथ कमर पर रख लिए।

'ये… पेन।' मानसी ने अपनी कलम बढ़ाते हुए कहा।

उसने एक नजर मानसी को देखा और फिर उसके हाथ से पेन ले लिया। फॉर्म लगभग भरा हुआ था। मानसी की नजर फॉर्म पर गयी तो उसने नाम भी देख लिया।

'ये रहा तुम्हारा पेन। थैंक यू।'

पेन लौटाकर वो हिस्ट्री विभाग के हेड आफिस के अन्दर चला गया। मानसी क्लास के अंदर आ गयी पर उसका दिमाग अभी भी पहले फ्लोर पर ही था।

'कहाँ रह गयी थी?' हुमा ने पूछा।

'मुझे वो लड़का मिला था।'

'कब? कहाँ? कैसे?' हुमा ने चहकते हुए सवालों की झड़ी लगा दी।

मानसी ने मुस्कुराते हुये उसे पेन की सारी कहानी सुना दी।
'तूने नाम देखा?'

'श्रेयस।'

'हैं?

'श्रेयस गांगुली।'

'बंगाली है?'

'मराठी है।' मानसी ने आँखे तरेरते हुए कहा।

'मजाक मत करो।'

'अरे तो मुझे क्या पता कि वो बंगाली है या नेपाली।' मानसी ने बैग से रजिस्टर निकलते हुए कहा।

'और क्या बात हुई?'

'कुछ नहीं।'

'कुछ नहीं मतलब?'

'कुछ नहीं मतलब, कुछ नहीं।'

तभी क्लास में शर्मा सर आ गए और दोनों की कन्वर्सेशन पर फुल स्टॉप लग गया।

क्लास ख़त्म होने के बाद दोनों सीढ़ियों से नीचे आ रही थीं कि उन्हें वहां श्रेयस दिखाई दिया वो लड़की भी साथ थी। दोनों किसी बात पर झगड़ रहे थे शायद। श्रेयस ने बात करते हुए ही सीढ़ी की तरफ देखा और मानसी को देख मुस्कुरा दिया। मानसी झेंप गयी, उसने इधर-उधर देखा तो सब लोग नीचे जाने में व्यस्त थे, मतलब वो मुस्कुराहट किसी और के लिए नहीं थी। हुमा ने देखा और कंधे से मानसी को हल्का सा धक्का दिया और मानसी थोड़ा लड़खड़ाते हुए एक सीढ़ी नीचे आ गयी। पर जब तक वो संभलती श्रेयस दोबारा झगड़ा करने या सुलझाने में व्यस्त हो गया था। मानसी सीढियां उतरने तक उसकी ओर देखती रही पर उसने दोबारा नहीं देखा। दोनों बाहर लॉन में आकर घास पर बैठ गयी।
'क्या कर रही थी तुम?' हुमा ने गुस्से से कहा।

'क्या कर रही थी?' मानसी ने झेंपते हुए कहा।

'वो तुझे देखकर मुस्कुराया और तूने क्या किया?'

'क्या किया?'

'तूने कबाड़ा कर दिया सारा।'

'मतलब?'

'मतलब वो तेरी ओर देखकर मुस्कुराया और तूने पलट कर एक फ़ीकी हँसी भी नहीं दी।'

'तो अब?'

'तो अब भूल जा उसे!' हुमा ने झूठे गुस्से में कहा।

मानसी हल्के से मुस्कुराई और उसके बाद दोनों ने अपना लंच निकाल लिया।
एक शाम साढ़े चार वाली क्लास कुछ देर तक चली। नवंबर का महीना चल रहा था। आख़िरी हफ्ता था तो प्रोफेसर को भी समय का ध्यान नहीं रहा। क्लास सवा छः बजे छूटी और बाहर कुछ अंधेरा भी हो गया था। हुमा आज आखिरी क्लास के लिए नहीं रुकी थी इसलिए मानसी अकेली थी। वो गेट के बाहर रिक्शा खोजने लगी, पर दूर-दूर तक वहां कोई रिक्शा वाला नहीं था। तभी उसे एक आवाज आयी।
'अरे तुम!'

मानसी ने पलटकर देखा तो श्रेयस था।

'तुम अभी तक यहां क्या कर रही हो?' श्रेयस ने हाथ मिलाने के लिए बढ़ाते हुए पूछा।

'क्लास देर से ख़त्म हुई। और अब रिक्शा नहीं मिल रहा है।' मानसी ने बस मुस्कुरा कर हेलो कहा।

'आओ मैं छोड़ देता हूँ, बताओ कहां जाना है।' कहते हुए श्रेयस अपनी बाइक पर बैठ गया और चाबी लगा दी।

'नहीं... मैं चली जाऊंगी।'

'कैसे जाओगी? यहां कोई रिक्शा भी नहीं मिलने वाला इस समय।' मानसी ने फिर भी कुछ नहीं कहा।

'अच्छा चलो ठीक है। मेट्रो स्टेशन तक छोड़ देता हूँ। अब ठीक है? अब चलो जल्दी बैठो।'

मानसी ने इधर-उधर देखा और श्रेयस के पीछे बैठ गयी।
'नाम क्या बताया था तुमने अपना?'

'मानसी। और अभी तक बताया नहीं था।'

श्रेयस ने मुस्कुराते हुए बाइक स्टार्ट की और एक जोर के झटके के साथ मानसी ने दोनों हाथों से श्रेयस का जैकेट पकड़ लिया।

'सॉरी।' श्रेयस ने कहा।

मेट्रो स्टेशन पहुंचकर श्रेयस ने बाइक रोक दी। मानसी नीचे उतर के जाने लगी। उसने पीछे मुड़कर देखा तो श्रेयस मुस्कुराया, और वो भी मुस्कुरा दी।




शाम हो गयी थी। पापा दफ्तर से घर आ गए थे। मानसी ने दरवाज़ा खोला, उनके हाथ में फलों की कुछ थैलियां थी। मानसी ने उनके हाथ से फल ले लिये और अंदर आ गयी।
'कब है तुम्हारे दोस्त की शादी?' पापा ने सोफ़े पर बैठते हुए पूछा।

'कल मेहंदी है। शादी परसों है।' मानसी ने कहा।

'ठीक है। तुम आराम से शादी अटेंड करो।'

पापा की बात पर मानसी मुस्कुरा दी। वो जानती थी की पापा भी चाहते हैं कि वो शादी के लिए हां कर दे। पर फिर भी उन्होंने कुछ कहा नहीं। मानसी ने फल ले जाकर फ्रिज में रख दिये। और चाय का कप उठाकर छत पर टहलने चली गयी। सूरज ढल चुका था, उसकी लालिमा भी ख़त्म हो गयी थी। पर अभी कुछ रोशनी बाकी थी, आसमान में चाँद मुस्कुरा रहा था और हल्की-हल्की हवा चल रही थी। उसने चाय का कप होठों से लगाया...

'चल ना यार कैंटीन चलते हैं, चाय पीने।' हुमा ने मानसी का हाथ खींचते हुए कहा।

ना चाहते हुए भी मानसी को उठना पड़ा। दोनों लॉ फैकल्टी के पास चाय पीने पहुंची। हुमा ऑर्डर दे रही थी और मानसी बैठने की जगह खोज रही थी। तभी उसे हवा में एक हाथ हिलता दिखाई पड़ा। हां! श्रेयस ही था। और मानसी को देखकर ही हाथ हिला रहा था। मानसी ने भी मुस्कुराकर हाथ हिला दिया। इधर हुमा दोनों हाथों में चाय पकड़े खड़ी थी और उधर श्रेयस इशारे से मानसी को बुला रहा था। दोनों वहां पहुंची और ग्रुप में बैठ गयीं।

'ये मानसी है। और मानसी ये विजय, ये समर और ये उमंग। उमंग तो तुम्हारे डिपार्टमेंट से ही है।'

'ये मेरी दोस्त हुमा।'

सबने सबको पहचाना। सब एक दूसरे की जन्मपत्री खंगाल रहे थे जब मानसी की नजर लॉ फैकल्टी से इधर आती लड़की पर पड़ी। ये तो वही लड़की थी, जिसे उसने अक्सर श्रेयस के साथ देखा था। उसने किसी और लड़के को बाँह से जकड़ा हुआ था और उसके साथ हँसते हुए कहीं जा रही थी। मानसी ने दोबारा श्रेयस की ओर देखा।
'क्या हुआ?' श्रेयस ने मूंगफली का दाना मुंह में रखते हुए पूछा।

'ये आपकी दोस्त थी ना, जो अभी...'

उसके इतना कहते ही विजय उमंग और समर ठहाके लगाकर हँसने लगे। मानसी को उनके हँसने की वजह समझ नहीं आयी, और न ही हुमा को।

'क्या हुआ?' मानसी ने पूछा।

'अरे कुछ नहीं मानसी। ये लड़की इसकी एक्स है।' विजय ने हंसी को रोकते हुए कहा।

'एक्स?' मानसी ने पूछा।

'हां। मेरी एक्स-गर्लफ्रैंड है।' श्रेयस ने चाय पीते हुए कहा।

'मतलब?'

'मतलब... गर्लफ्रैंड थी, अब नहीं है।' उमंग ने कहा।

'अब क्यों नहीं? उन्होंने तुम्हें छोड़ दिया? तुमने कुछ किया था क्या?' हुमा ने चुटकी लेते हुए पूछा।

'इसके बिना कुछ किये ही लड़कियाँ इससे इम्प्रेस भी हो जाती हैं और डिप्रेस भी।' समर ने कहा और तीनों फिर ठहाके लगाकर हँसने लगे।

'अरे बस करो यार… और कितना मजाक बनाओगे!' श्रेयस ने कहा।

'क्लास का टाइम हो गया है।' हुमा ने घड़ी देखते हुए कहा।

'हम लोग चलते हैं। क्लास है इम्पॉर्टेन्ट। बाद में मिलते हैं।' मानसी ने कहा।

दोनों वहां से उठकर क्लास के लिए चली गयी। पर मुलाक़ातों का जो सिलसिला शुरू हुआ वो नहीं रुका। कभी लाइब्रेरी, कभी डिपार्टमेंट तो कभी चाय की दुकान के पास, मानसी अक्सर श्रेयस से टकरा जाती थी। दोनों कुछ देर बात करते और उसके बाद वो चली जाती। एक दिन लाइब्रेरी के सामने विजय और समर मिले।

'जन्मदिन है उसका कल।' विजय ने कहा।

'किसका जन्मदिन?' हुमा ने पूछा।

'श्रेयस का।' समर बोला।

'तो तुम दोनों सुबह 10 बजे यहाँ पहुंच जाना, लेट मत होना।' विजय ने कहा।

'पर क्यों? और हमें कहीं चलना है क्या यहाँ से..?' मानसी ने पूछा।

'कल सुबह पता चल जाएगा। तुम दोनों बस समय पर फैकल्टी गेट पर पहुंच जाना।' विजय हड़बड़ाते हुए बोला और फिर दोनों वहां से चले गए।


'दीदी! तुमको पापा बुला रहे हैं।' अभिषेक की आवाज से मानसी का ध्यान टूटा।

'आती हूँ।' मानसी ने कहा।

रात के साढ़े आठ हो रहे थे। थोड़ी देर में खाने का समय हो रहा था। मानसी नीचे आयी तो पापा टीवी देख रहे थे। वो चुपचाप उनके पास सोफ़े पर बैठ गयी।

'कल कहाँ जाना है और कितने बजे?' माँ ने खाना मेज पर रखते हुए पूछा।

'दोपहर तक पहुंचना है। मेहंदी का फंक्शन है।'

'और जाना कहाँ है?'

'मॉडल टाउन, फेज-2।'

'तुम चली जाओगी ना?' पापा ने पूछा।

'हां।' मानसी ने कहा।

लगभग आधे घंटे में सबका खाना खत्म हुआ। मानसी किचन साफ करने में माँ की मदद करने लगी। फिर सबने साथ में आइस-क्रीम खायी। इतने समय बाद घर आकर मानसी को सुकून मिल रहा था। आइस-क्रीम ख़त्म करके सब सोने चले गए। मानसी भी अपने कमरे में आ गयी। उसने दरवाज़ा बन्द किया और बिस्तर पर चली गयी। आँखों के सामने फिर वो दिन था...

सवा दस हो रहे थे और तीनों में से कोई वहां नहीं पहुंचा था। मानसी और हुमा उनका इंतजार कर रही थीं। थोड़ी देर बाद वहां एक सफ़ेद बोलेरो आकर रुकी। शीशा नीचे करके समर ने दोनों को अंदर बैठने को कहा। गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर दोनों अंदर बैठ गयीं।

'हम जा कहां रहे हैं?' हुमा ने चहकते हुए पूछा।

'उसके घर।' उमंग ने कहा।

'और विजय कहाँ हैं?' मानसी ने पूछा।

'वो केक लेकर पता नहीं कब से उसकी बिल्डिंग के नीचे खड़ा है। बस हम सबका इंतजार हो रहा है।' समर ने कहा।
श्रेयस अकेला रहता था। विजय नगर में उसने एक पूरा फ्लोर किराए पर लिया हुआ था। अक्सर जरूरत के समय लोगों की मदद भी कर दिया करता था। उसके घर का दरवाज़ा हमेशा खुला ही रहता था और एक कमरा हमेशा खाली भी। चारों वहां पहुँच गए। विजय बाहर केक लेकर खड़ा था।

'सालों और देर से आते थोड़ा!' विजय ने ग़ुस्से से कहा।
सब हँस दिए और सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। मानसी सबसे पीछे थी। जैसी खबर थी, उसके घर का दरवाज़ा खुला हुआ था। सब अंदर घुसे तो श्रेयस सोफ़े पर सोया हुआ था। उसे देखकर मानसी मुस्कुरा दी।

'श..श...' विजय ने मुंह पर उंगली रखते हुए इशारा किया।
फिर सब एक ही बारी में जोर से चिल्लाये, 'Happy Birthday To you...!' श्रेयस उठकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे से साफ़ झलक रहा था कि वो अभी भी आधी नींद में है। मगर सबने उसे उठकर जाने के लिए कहा। सब बाहर ही सोफ़े पर बैठकर उसका इंतजार करने लगे। थोड़ी देर बाद वो कमरे से बाहर आया।

'क्या साले? रात भर सोया नहीं था क्या?' विजय ने पूछा।

'सोया था, पर ऐसे कौन जगाता है!' श्रेयस ने कहा।

केक को मेज पर रखा गया, उस पर कैंडल्स लगाई गयीं, और फिर श्रेयस के हाथ में चाकू थमा दिया गया। उसने केक काटा और सबने फिर एक बार हैप्पी बर्थडे विश किया। इसके बाद सब केक खाने और लगाने में व्यस्त हो गए।

'तुम तीनों का तो समझ आता है पर ये दोनों यहाँ कैसे?' श्रेयस ने पूछा।

'अरे ये दोनों कल लाइब्रेरी के बाहर दिख गयीं तो हमने सोचा इस बार जन्मदिन कुछ अलग मनाया जाए।' विजय ने कहा।

'भूख लगी है यार।' उमंग ने फ्रिज टटोलते हुए कहा।

'घर में बस मैगी है।' श्रेयस ने कहा।

'बनाएगा कौन?' उमंग ने आलस भरी आवाज़ में पूछा।

'मैं बना देती हूँ।' मानसी ने कहा।

श्रेयस ने उसकी ओर देखा और किचन की ओर इशारा कर दिया।
'क्यों बे? आज तो नहीं आने वाला न कोई यहां?' समर ने पूछा।

'नहीं। आज ये खाली है।'

सब आपस में बात करने लगे और श्रेयस का ध्यान अकेले किचन में काम कर रही मानसी पर गया। वो भी उठकर अंदर आ गया।
'तुम्हें मदद चाहिए?'

'हां। नमक कहाँ रखा है? और लाल मिर्च भी।'

'वो वहां कोने में गैस के पास है नमक और लाल मिर्च पाउडर नहीं है। हरी से काम चला लो।'

मानसी ने कड़ाही में तेल डाला और फिर उसमें प्याज। थोड़ा भूरा होने के बाद टमाटर भी डाल दिए। उसके एक हाथ में चमचा था और दूसरा हाथ कमर पर था। अचानक उसे अपने सिर पर किसी के हाथ महसूस हुए। श्रेयस उसके माथे पर झूलती लटों को कान के पीछे कर रहा था। दोनों ने कुछ सेकण्ड्स तक एक दूसरे को देखा और वो फिर बर्तन में चमचा घुमाने लगी। श्रेयस ने हाथ पीछे कर लिए। उसके बाद मानसी की उसकी ओर देखने की हिम्मत नहीं हुई। वो मैगी बनाने में ही मशगूल रही और एक बार भी श्रेयस की तरफ नहीं देखा। पर श्रेयस वहीं खड़ा रहा, उसे देख रहा था या नहीं, पता नहीं। पर वहीं था, जब तक मैगी बन कर तैयार न हो गयी। गैस बन्द करके मानसी किचन से बाहर जाने लगी तभी श्रेयस ने उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लिया। श्रेयस के दोनों हाथ मानसी की कमर पर थे, मानसी का एक हाथ उसकी पीठ पर था तो दूसरा शर्ट की जेब के ऊपर। दोनों कुछ सोच या कर पाते उससे पहले ही बाहर से कुछ गिरने की आवाज़ आई। मानसी ने हाथ हटाया और दोनों बाहर आ गए।

'क्या हुआ ये?' श्रेयस ने पूछा।

'ये महाराज बॉल उतार रहे थे टेबल पर चढ़के, खुद ही बॉल बन गए।' समर ने कहा।

सब बाहर हंस रहे थे। उनकी बात सुनकर श्रेयस भी मुस्कुराया पर मानसी का चेहरा अब भी लाल था। वो दोबारा किचन के अन्दर चली गयी।

'ये कितना टाइम लगाएगी। रुक्क... आती हूँ मैं।' हुमा ने कहा और उसके पीछे-पीछे किचन में चली गयी।
कुछ देर बाद कटोरियों में मैगी परोसी गयी। सब बैठकर खा रहे थे। पर श्रेयस का ध्यान कहीं और ही था शायद।

'क्या हुआ बे? जन्मदिन है ना तेरा? चेहरे की हवाइयां क्यों उड़ी हुई हैं?' विजय ने पूछा।

'ऐसा कुछ नहीं है।' श्रेयस ने कहा और खाने लगा।

'चलो बताओ भाई? किसकी कितनी गर्लफ्रैंड या ब्वॉयफ़्रेंड रहे हैं?' उमंग ने पूछा।

'मेरी तो एक ही थी वो भी चली गयी।' समर ने कहा।

'मेरी एक भी नहीं।' विजय ने कहा और हुमा की ओर देखकर मुस्कुराया। यह केवल मानसी ने नोटिस किया, वो किसी भी तरह श्रेयस की नजरों से बचना चाह रही थी। मगर श्रेयस उसे ही देख रहा था... शायद।

'मेरा कोई ब्वॉयफ़्रेंड नहीं है।' हुमा ने भी जवाब दिया।

'और इसकी। इसके पास तो गिनती भी ख़त्म हो जाएगी लेकिन लड़कियाँ नहीं।' उमंग ने श्रेयस को देखते हुए कहा।
सब उसकी बात पर हँसने लगे। पर ना तो श्रेयस को हंसी आयी और ना ही मानसी को।

'मैगी बहुत ही अच्छी बनी है मानसी।' विजय ने कटोरी उठाते हुए कहा।
मानसी मुस्कुरा दी।

'अब हम चलते हैं।' हुमा ने कहा।

'अरे कहाँ? थोड़ी देर और रुकिए।' विजय ने कहा।

'फिर कभी। अभी जाना है, वरना देर हो जाएगी।' मानसी ने कहा।

'चलो हम छोड़ आते हैं मेट्रो तक।' उमंग ने कहा।

'नहीं हम चले जाएंगे।' मानसी ने कहा।

दोनों से सबको बाय कहा। मानसी ने पीछे मुड़कर श्रेयस को देखा। और फिर दोनों नीचे चली गयीं। रास्ते में मानसी ने सारा किस्सा हुमा को बताया।
'क्या?! उसने तुमको अपनी तरफ़ ऐसे खींचा!' हुमा ने पूछा।
'हां।' मानसी ने सिर झुकाते हुए कहा।
'थप्पड़ क्यूँ नहीं रसीद किया तुमने उसको!?'
'थप्पड़…?'
'और क्या? वो समझता क्या है खुद को, पता नहीं किस बात की इतनी अकड़ है उसमें। दूर से देखने में सही लगता था, पर अब लगता है वो लड़का कहीं से भी तेरे लायक नहीं है।'

मानसी ने कुछ नहीं कहा। उसका मन और आत्मा धरती से आसमान के चक्कर काट रहे थे।

'तुम दूर रहो उससे। वो लड़का ठीक नहीं है।' हुमा ने कहा।

मानसी ने सिर हिला दिया। दोनों मेट्रो पहुंच चुकी थीं। जिसके बाद मानसी रास्ते भर उस किचन के वाक़ये को सोचती रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि हुमा की बातों में सच्चाई थी या फिर श्रेयस की आँखों में...


सुबह नींद खुली तो माँ कमरे का सामान समेट रही थीं।
'समय हो गया है। तुम्हें जाना नही है?' माँ ने कहा।

मानसी उठकर नहाने गयी और फिर कुछ ही देर में तैयार हो गयी। उसका नया पिंक सूट उसपर जँच रहा था। जाने से पहले माँ ने उसकी नजर उतारी और फिर मानसी कैब में बैठ गयी। कैब में बैठते ही निशा का फ़ोन आ गया...

'कहाँ है तू? कब पहुंचेगी?'

'बस रास्ते में हूँ। आधा घंटा लगेगा।'

'ठीक है। जल्दी आ।'

मानसी ने फ़ोन अपने बैग में रख दिया और खिड़की से बाहर झाँकने लगी। कुछ नहीं बदला यहां, सब वैसा ही तो है। मौसम, सड़कें, गाड़ियां, ये भीड़... सब कुछ। रेडियो पर किशोर कुमार का 'ये शाम मस्तानी...' बज रहा था। उसका फेवरेट गाना था ये। किशोर दा का बहुत बड़ा फैन था वो। मानसी मुस्कुरा दी, और खिड़की के बाहर झाँकने लगी।


'मानसी...!' किसी के जोर से चिल्लाने की आवाज आयी।
मानसी और हुमा दोनों ही पीछे मुड़कर देखने लगे। विजय की आवाज थी और उसके साथ श्रेयस भी था।

'क्या यार? तुम दोनों तो गायब ही हो गयी। कहाँ हो आजकल?' विजय ने पूछा।

'असाइनमेंट्स और टेस्ट्स में बिजी हैं थोड़ा।' हुमा ने कहा।

'और तुम लोग?' हुमा ने पूछा।

'कुछ नहीं बस पढ़ाई-लिखाई थोड़ी बहुत।' विजय ने ही जवाब दिया।

'चाय पियोगी? मेरा मतलब है हम सब चलते हैं। थोड़ा टाइम तो होगा ही।' विजय ने कहा।

हुमा और मानसी ने एक दूसरे को देखा और फिर चारों लॉ फैकल्टी की ओर चल दिए। विजय और हुमा आगे चल रहे थे, श्रेयस-मानसी उनके ठीक पीछे। चलते हुए ही श्रेयस का हाथ मानसी के हाथ से टकरा गया... वो रुक गयी और फिर चलने लगी। श्रेयस उससे एक कदम पीछे हो गया। दोनों ने रास्ते भर कोई बात नहीं की। वहां पहुंचकर श्रेयस ऑर्डर देने चला गया। और फिर जानबूझकर मानसी के ठीक सामने बैठ गया।

'तुम लोगों का एग्जाम कब से है?' श्रेयस ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा।

'दो हफ़्ते बाद से ही।' हुमा ने कहा।

'इसके बाद तो तुम लोग सीनियर बन जाओगे।' विजय ने कहा।

मानसी श्रेयस को देख रही थी और वो चाय की चुस्कियों में खोया हुआ था।

'मैं चलती हूँ।' मानसी अपनी जगह से खड़ी होकर बोली।

'कहाँ जाना है?' हुमा ने कहा।

'लाइब्रेरी।'
'पर क्यों? अभी तो बैठे हैं इतने दिनों बाद।' विजय ने कहा।

'कुछ जरूरी काम है। तुम लोग बैठो, मैं चलती हूँ।' मानसी ने कहा और अपना बैग उठाकर चली गयी।

हिस्ट्री सेक्शन में किताबों के बीच बैठी मानसी थोड़ी घबराई हुई थी। उन दिनों ज्यादातर बच्चे घरों में बैठकर पढ़ाई कर रहे थे इसलिए लाइब्रेरी भी खाली थी लगभग। उसे कंधे पर किसी का हाथ महसूस हुआ और वो झटके से खड़ी हो गयी।
'तुम!'

'हाँ…' श्रेयस ने कहा।

'क्या हुआ है तुम्हें? कई दिनों से देख रहा हूँ। तुम कुछ परेशान हो? कोई बात है क्या?' श्रेयस ने पूछा।

'नहीं। तुम जाओ यहां से।' मानसी ने किताब को रैक में रखते हुए कहा।

श्रेयस ने उसकी ओर एक कदम बढ़ाया तो उसका तन और सिहर गया... वो कुछ बोल पाता इससे पहले ही मानसी ने उस पर हाथ उठा दिया। कुछ पल बिलकुल ख़ामोशी रही और फिर मानसी तेज़ कदमों से वहाँ से चली गयी। लाइब्रेरी के बाहर आने के बाद भी उसका हाथ कांप रहा था। उसकी आँखें लाल थी और माथे पर पसीना था।

कार के खुले शीशे से आती सर्द हवा के बावजूद मानसी के माथे पर पसीना था। कैब मॉडल टाउन पहुंच चुकी थी। कुछ ही देर में मानसी निशा के सामने थी। दोनों ने एक दूसरे को गले लगाया। फिर दोनों ही मेहंदी लगवाने बैठ गयीं।

'तो? क्या सोचा है तूने?' निशा ने पूछा।

'किस बारे में?' मानसी ने कहा।

'अरे शादी!'

'नहीं करनी।'

'ज़िद है?'

'हां।'

'पर कब तक ऐसे अकेले रहेगी?'

मानसी के हाथ की मेहंदी पूरी हो चुकी थी। वो अपनी जगह से उठकर चली गयी। कुछ देर बाद तक लगभग सारी औरतों की हथेलियों में मेहंदी लग चुकी थी। वहां उसकी कुछ और पुरानी सहेलियां भी आयी हुई थीं। उनके साथ वक़्त गुजर गया और शाम ढलने को आ गयी। मानसी ने घर तक के लिए कैब बुक कर ली और बाहर खड़े होकर कैब का इंतजार करने लगी। मार्च की शामें कुछ सर्द होती हैं। दिन भर मौसम गर्म रहता है और शाम ढलते ही सुहावना हो जाता है। शहर में तारे तो कम ही नजर आते हैं मगर चाँद पूरा निकलता है। पूर्णिमा से एक रात पहले का थोड़ा अधूरा चाँद आसमान में निकल आया था और अपनी सफेद रौशनी चारों तरफ बिखेर रहा था। मानसी खिड़की से सिर टिकाये कैब में बैठी हुई आसमान में चाँद को देख रही थी।

समय कितना जल्दी बीत जाता है ना। और जो वर्तमान है वो हर गुज़रते पल के साथ हमारे अतीत का हिस्सा बनता जाता है। आज से आठ साल पहले ये शहर, यहां की गलियाँ, ये सड़कें… मुझसे अनजान नहीं थे। पर आज लगता है जैसे मैं इस शहर को जानती ही नही हूँ। ये सब कुछ अजनबी सा लगता है, जैसे मेरा इन गलियों से कोई नाता ही ना हो। पर चाँद तो सब जगह एक ही निकलता है, वो तो सब के हिस्से आता है, फिर चाहे शहर अपना लगे या ना लगे चाँद हमेशा अपना सा ही लगता है। कल ये चाँद पूरा हो जाएगा, और उसके बाद धीरे-धीरे घटने लगेगा... और एक दिन आसमान में इसका अंश तक नहीं होगा। इसकी चाँदनी दुनिया को रौशनी नहीं देगी तो क्या दुनिया इस प्रकाश की उम्मीद छोड़ देगी? नहीं, वो इंतजार करेगी... उस रात के गुज़र जाने का, दोबारा चाँद निकलने का।

घर आ गया था... मानसी कार का दरवाज़ा खोल बाहर निकल आयी, कैब वाले को पैसे दिए और फिर घर के अंदर आकर सीधा अपने कमरे में चली गयी। नौ बजे माँ ने खाने के लिये आवाज़ लगाई तो मानसी कमरे के बाहर आ गयी।

'कैसा रहा आज का दिन?' पापा ने पूछा।

'अच्छा था।'

'कल शादी भी मॉडल टाउन में ही है?'

'नहीं। शादी पीरागढ़ी के एक बैंक्वेट हॉल में है।'

'ठीक है।'

'मुझे भूख नहीं है। शाम को वहां खा लिया था, मैं सोने जा रही हूँ।'

'हां। जाओ आराम करो।'

'कल कब जाना है?' माँ ने पूछा।

'सुबह ही। सारी फ्रेंड्स सुबह ही उसके घर पहुंच जाएंगी। इसलिए मुझे भी सुबह ही पहुँचना है। आप आठ बजे उठा देना मुझे।'

'ठीक है। अपने कपड़े निकाल देना जो लेकर जाने हों।' माँ ने कहा।

मानसी अपने कमरे में आ गयी। अलमारी खोली तो ध्यान फिर पिंक स्कार्फ़ पर गया।


थप्पड़ वाले दिन के बाद श्रेयस ने फैकल्टी आना कम कर दिया था। मानसी कहीं दिख भी जाती तो वह अपना रास्ता बदल देता। मानसी भी उससे उचित दूरी बनाकर रखती थी। आज आख़िरी एग्जाम था, समय शाम का होने की वजह से अक्सर एग्जाम में देरी हो जाती थी। शाम छः बजे मानसी गेट पर खड़ी रिक्शा का इंतजार कर रही थी। तभी उसके पास हुमा और विजय पहुंचे।

'तू घर जा रही है?' हुमा ने पूछा।

'हां।'

'टॉम अंकल के पास उमंग और श्रेयस हमारा इंतजार कर रहे हैं।' विजय ने कहा।

'तू चल हमारे साथ।' हुमा ने मानसी का हाथ पकड़ते हुए कहा।

'नहीं। तुम लोग जाओ।'

'अरे आज आखिरी एग्जाम था। थोड़ा चिल तो कर सकते हैं ना। चल ना...' हुमा ने ज़िद की।

दोनों ने मानसी का हाथ पकड़ा और चल दिए। मानसी मना करती रही पर दोनों ने उसकी बात नहीं सुनी। आर्ट्स फैकल्टी से अगली रेड लाइट के पास ही कोने पर टॉम अंकल की दुकान थी। दुकान के दायीं ओर लगी छोटी-छोटी कुर्सियों पर उमंग और श्रेयस बैठे थे। सब लोग बैठ गए... मानसी श्रेयस के दायीं तरफ बैठी थी।

'क्या यार... एग्जाम कितनी जल्दी खत्म हो गए।' उमंग ने कहा।

'नहीं... अच्छा ही हुआ। पर अब ये दो तीन महीने की छुट्टियाँ... हाय, कैसे गुजरेंगी!' हुमा ने कहा।

'वही तो, और हमारा तो टिकट भी आ गया... कि बेटा एम ए हो गया है, घर वापस लौट आओ।' विजय ने कहा।

'तेरा क्या प्लान है श्रेयस?' उमंग ने पूछा।

'कोलकाता वापस।' श्रेयस ने कहा।

सबकी आँखें श्रेयस पर जा टिकीं। मानसी भी उसकी ओर देख रही थी। पिछले 5 सालों में श्रेयस बस एक बार कोलकाता गया था, वो भी अपनी दादी के अंतिम संस्कार के लिए। उसके अलावा किसी छुट्टी, किसी त्योहार में वह कहीं नहीं गया। न तो परिवार के पास और ना ही किसी रिश्तेदार के घर। इसलिए उसके कोलकाता जाने की बात सुनकर सब चौंक गए।

'पर अचानक क्यों? तेरा तो नेट क्लियर है ना... आराम से पीएचडी की तैयारी कर सकता है तू, और यहां एडमिशन भी हो ही जाएगा तेरा। फिर कोलकाता क्यों?' उमंग ने कहा।

'बाबा बुला रहे हैं, उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं रहती, अब वहीं से करनी पड़ेगी आगे की पढ़ाई भी… तो सोचा आज आखिरी बार तुम सबसे मिल लूँ।' श्रेयस ने कहा।

श्रेयस की दलील पर सब चुप हो गए। एग्जाम खत्म होने की खुशी एक पल में ओझल हो गयी। पिछले कुछ दिनों की दोस्ती के दिन उनकी आँखों के सामने घूम रहे थे। इन दिनों की दोस्ती लगभग मरते दम तक सांसें लेती है या शायद उसके बाद भी। हम ना भी रहें, ये कॉलेज की बिल्डिंग, क्लासेज, कॉरिडोर, लाइब्रेरी, बाहर की सड़कें, ये दुकानें, कैंटीन, हर वो बेंच जहां बैठकर लंच टाइम साथ बीता हो, या आने वाले समय के इलेक्शन की चर्चा हुई हो, जहां बैठ के मूवीज का प्लान बना और कैंसिल हुआ हो... ये सब याद रखते हैं हमें, हमेशा। हम जगह भूल जाते हैं, पर जगह हमें कभी नहीं भूलती।

शाम के सात बज रहे थे। उमंग घर जा चुका था। विजय और हुमा भी जा ही रहे थे। श्रेयस और मानसी भी अपनी जगह से उठ खड़े हुए।

'चलती हूँ। बाद में मिलते हैं कभी।' हुमा ने कहा।

'बिल्कुल। ध्यान रखना अपना।' श्रेयस ने कहा।

'चलता हूँ।' कहकर विजय ने श्रेयस को गले लगाया।

उनके जाने के बाद मानसी ने कई महीनों से लगातार बनी हुई चुप्पी तोड़ी।

'तुम मुझे मेट्रो तक छोड़ सकते हो?'

श्रेयस ने उसकी ओर देखा...

'हां। चलो।'

उसने बाइक स्टार्ट की और मानसी पीछे बैठ गयी। दौलतराम, मैथ्स फैकल्टी गेट, श्रीराम कॉलेज, आर्ट्स फैकल्टी, और फिर पटेल चेस्ट... ये सारे गुज़र गए। आखिर में मिरांडा हाउस कॉलेज के आगे मानसी ने श्रेयस से बाइक रोकने को कहा।

'पर क्यों? तुम्हें देर नहीं हो रही है?' श्रेयस ने कहा।

मानसी बाइक से उतर के फुटपाथ पर बने एक बेंच पर बैठ गयी। शाम लगभग ढल चुकी थी। बाइक लगाने के बाद श्रेयस उसके बगल में आकर बैठ गया। उनके बीच एक दूरी थी... कुछ समय तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। उन दोनों के बीच का सन्नाटा आसपास भी पसर गया।

'तुम्हें पहली बार आर्ट्स फैकल्टी के बैक गेट पर देखा था, अपने पापा की बाइक से उतरते हुए। उसके बाद खोजने की कोशिश की पर तुम नहीं दिखी। फिर मैंने भी उम्मीद छोड़ दी... पर उस दिन जब तुमने पेन ऑफर किया तो लगा शायद किस्मत अब भी साथ है। सीढ़ियों से उतरते हुए तुम्हें देखकर स्माइल किया...पर तुमने कोई जवाब नहीं दिया। तो मैंने दोबारा पलट कर देखा भी नहीं; इगो है ना! उस शाम जब तुम्हें मेट्रो तक ड्रॉप किया तो लगा शायद किसी और दिशा में जा रहा हूँ। सोनिया से ब्रेक-अप का जरा भी दुख नहीं हुआ। उस चाय के बाद हमारी दोस्ती बढ़ गयी, जिसमे मैं खुश था। पर जन्मदिन वाले दिन के बाद लगा... कितना गलत हूँ मैं! दुनिया मेरे और मेरी फीलिंग्स के हिसाब से नहीं चलती। ये समझ आ गया है, इसलिए जा रहा हूँ...'

'वापस कब आओगे?' मानसी ने पूछा।

'पता नहीं।'

'ये सब पहले क्यों नहीं बताया...?'

'क्योंकि मुझे नहीं आता... बताना। आज भी मैं तुम्हें एक कहानी सुना रहा हूँ बस। इसे कहानी समझ के ही भूल जाना।'

'तुम्हारे दिल में घुसना आसान नहीं है...'

'पर मेरे कमरे में घुसना बहुत आसान है।'

ये सुनकर मानसी ने उसकी ओर देखा। वो सामने सड़क की तरफ देख रहा था।

'यही हूँ मैं। ऐसा ही रहा हूँ हमेशा से। कुछ झूठ या गलत नहीं समझा है तुमने। बस तुम्हारे लिए कभी ऐसा नहीं सोचा। उस दिन लाइब्रेरी यही कहने आया था...'

मानसी की आँख से आंसू निकला और श्रेयस के हाथ पर आ गिरा...

'सॉरी...' मानसी ने रुँधे हुए गले से कहा।

दोनों फिर कुछ देर तक ख़ामोश रहे... शाम और गहरी हो रही थी। समय था तो कुछ कहने-सुनने को नहीं था और आज कहने-सुनने के लिए बहुत कुछ था, पर समय साथ नहीं था। हवा थोड़ी सर्द हुई और पेड़ के पत्ते शाख से टूट कर गिरने लगे। मानसी खिसक कर श्रेयस के पास आ गयी। उसने अपना बायाँ हाथ श्रेयस के हाथ पर रखा और अपना सिर उसके कंधे पर रखकर आँखें बन्द कर लीं। पानी की कुछ बूंदे मानसी के माथे पर थीं और कुछ श्रेयस के कंधे पर। और ऐसे ही उस शाम के कुछ और पल अतीत का हिस्सा बन गए...

सुबह नींद खुली तो माँ कमरे की सफ़ाई कर रही थीं। मानसी ने बिस्तर पर ही अंगड़ाई ली और फिर नहाने चली गयी।

उस शाम वहां बहुत कुछ ख़त्म हो गया... और शुरू भी। कंधे से सिर हटाया तो मानसी ने श्रेयस की आँखों में लगे पानी को अपने स्कार्फ़ में समेट लिया... और दोनों मुस्कुराए। हाथ पकड़े ही दोनों बेंच से उठे और श्रेयस ने बाइक स्टार्ट की... रास्ते भर दोनों खामोश रहे। जैसे बात करने के लिए अब कुछ बचा ही न हो। जैसे उम्र भर की सारी बातें उनकी ख़ामोशी ने कर ली हो और अब कुछ न बचा हो। मेट्रो स्टेशन के गेट पर बाइक रुकी और मानसी उतर के जाने लगी।

'मानसी?'

'हां।'

'इंतजार करोगी?'

वो मुस्कुराई, श्रेयस ने भी मुस्कुराते हुए बाइक स्टार्ट की, दोनों चले गए मगर दोनों ने ही पीछे मुड़कर नहीं देखा...

घर के बाहर कैब मानसी का इंतजार कर रही थी। वो तैयार होकर अपना बैग लिए हॉल में माँ से कुछ बात कर रही थी। तभी उसका फ़ोन बजा, उसने फ़ोन उठाया और जल्दबाजी में घर से बाहर निकल गयी।

'हेलो!'

'कौन? हुमा?' मानसी ने कहा।

'हां।'

मानसी ने बैग कैब के अंदर रखा और पीछे मुड़कर देखा तो माँ दरवाज़े पर खड़ी उसके जाने का इंतजार कर रही थीं। वो कैब में बैठ गयी।

'हां हुमा? कैसी हो?' मानसी ने पूछा।

'ठीक हूँ। सुना है तुम शहर आयी हो। और वो भी मुझे नहीं बताया...'

'सॉरी हुमा यार वो अचानक ही आना हो गया।'

'हां! मेरे निकाह पर तो तुम नहीं आयी थी।'

'बोला ना...सॉरी! पक्का मिलती हूँ तुमसे। जल्दी ही।'

'वैसे... कौन-कौन आया था निकाह में?' मानसी ने पूछा।

उमंग, समर, विजय तीनों ही। पर श्रेयस नहीं आया।'

उसकी बात सुनकर मानसी थोड़ा उदास हुई... पर फिर सम्भल गयी।

'तो अब? तुम क्या करोगी?' हुमा ने पूछा।

'क्या करोगी मतलब?' 

'मतलब श्रेयस? उसने इतने सालों में सिर्फ कुछ फ़ोन कॉल्स किये और अब वो भी नहीं। तो तुम शादी…'

मानसी धीमे से मुस्कुरायी, ''इंतजार... और क्या?'

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