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"मेरी समझ"




ये कितनी समझदार है! वो कितना समझदार है! तुम समझदार हो इसलिए मुझे पसंद हो! तुम परिपक्व हो इस नाते तुम्हें समझदार होना चाहिए!, चलो! प्रस्फुटित हुई बेताब सी ख्वाहिशों का घला घोट देते हैें और समाज के मनगढ़त नियमों को मानकर और ये सोचकर कि किसी को ठेस न पहुँचे चलो, इस तरह से भी समझदार बनते हैं.....


          ऐसी ही कितनी बेकार और खोखली बातें हम अपने अंर्तमन में गढ़ते रहते हैं या यूँ कहें, हमसे ऐसी बाते गढ़वाई जाती हैं क्योंकि हमें तो इस सॉ- काल्ड समाज के बनाए हुए इस समझदारी के फ्रेम में फिट जो बैठना है और तो और तुम इस उधेड़- बुन में लग भी जाते हो क्योंकि दो- चार लोग तुम्हारी तारीफें जो कर रहे हैं, एक ख़ास झुंड का तुमको हिस्सा बना दिया गया है, और सबसे खास बात इस अज़ीरन सी भीड़ में समझदारी को चस्पाँ कर एक औदा थमा दिया गया है, कि भई! फलाँ व्यक्ति बहुत ही "समझदार" है| भले हि फलाँ व्यक्ति की जान पर बन आई हो और समझने- समझाने की इस प्रक्रिया में दिमाग की नसें तक विस्फोटित हो जाएँ....पर नहीं! आपको तो समझदार बनना है।

भले ही इसके लिए तुम्हें अपनी इच्छाओं को मारना पड़े, अंर्तमन में एक युद्ध से जूझना पड़े, भले ही वो उम्र भर एक फोड़े की तरह टीस देता रहे़.... पर नहीं तुम्हें तो ये सब झेलना है और उफ्फ!! तक नहीं करनी क्योंकि तुम तो 'समझदार' हो न! ये जानते हुए भी कि किसी को फाँक भर भी र्फक नहीं पड़ता कि तुम क्या चाहते हो, तुम सच में क्या सोचते हो, तुम्हारे अंदर भी एक अतरंग सा नन्हा सा मन है जो ऊट- पटांग बाते करना चाहता है, शरारतें करना चाहता है, जो नादानियों और अठखेलियों से भरे समंदर में गोते लगाना चाहता है, जो दिवारों से, हवाओं से और कभी- कभी खुद से बड़बड़ाकर ओछी बातें करना चाहता है..... हाँ, ये सब चाहता है ये नन्हा सा मन।


अरे! ये मैं किन बेकार कि बातों में खो गई, ओ हो! माफ कीजिए वो... हर बार कि तरह ट्रैक से उतर गई थी| मेरा बोझिल मन! जिसका समाज के बनाए हुए समझदारी के पैमाने में इन चंचल तितलियों का जिक्र तक नहीं है| और ये सब मैं सोच भी कैसे सकती हूँ| मैं परिपक्व हूँ नादानियों से भरी उम्र का पड़ाव पार कर चुकी हूँ और अब मैं "समझदार" हूँ।

By:  रंजना मिश्रा 


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